
श्री योगी आदित्यनाथ
माननीय मुख्यमंत्री,
उत्तर प्रदेश सरकार
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बार-बार पड़ने वाले सूखे से निपटने के लिए निजी सिंचाई साधनों के विकास की जो यात्रा 19वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुई, वह वर्ष 1964 में एक स्वतंत्र लघु सिंचाई विभाग के रूप में स्थापित हुई।
भीषण सूखों ने सिंचाई के नियोजित एवं त्वरित विकास का महत्व स्पष्ट किया।
प्रथम इरीगेशन कमीशन का गठन; निजी सिंचाई साधनों के विकास हेतु सुझाव दिए गए।
Agricultural Reorganization समिति ने नलकूप, छोटी बोरिंग व कूप छेदकों के प्रशिक्षण की अनुशंसा की।
मुख्य कृषि अभियन्ता के अधीन कार्य शुरू; मेरठ, कानपुर व वाराणसी में तीन जोन मुख्यालय बने।
1 जुलाई को विभाग नियोजन विभाग से सम्बद्ध किया गया।
शासनादेश सं0 5819/38-8-517/1964 दिनांक 08.10.1964 द्वारा लघु सिंचाई विभाग की स्थापना।
सूखे की बार-बार पड़ने वाली विभीषिका से निपटने हेतु 19वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सिंचाई के विकास के महत्व को समझा जाने लगा था। वर्ष 1897-98 एवं 1899-1900 में पड़े भयंकर सूखों में सिंचाई के नियोजित एवं त्वरित विकास ने महती भूमिका निभायी। वर्ष 1901 में गठित प्रथम इरीगेशन कमीशन को देश में सूखे के विरूद्ध निपटने में सिंचाई के क्षेत्र में रिपोर्ट उपलब्ध कराने का कार्य सौंपा गया। कमीशन द्वारा निजी सिंचाई साधनों के विकास हेतु कतिपय सुझाव दिये गये। वर्ष 1939 में शासन द्वारा Agricultural Reorganization समिति गठित की गयी, जिसने वर्ष 1941 में अपनी रिपोर्ट दी। इसमें अन्य के अलावा जल उठाने के साधन/मशीनरी, छोटी बोरिंग, नलकूप, कूप छेदकों की ट्रेनिंग आदि के सम्बन्ध में कतिपय अनुशंसायें की गयी थी। उपरोक्त संस्तुतियों को वर्ष 1947 में मुख्य कृषि अभियन्ता के अधीन कार्यान्वित किया गया। सिंचाई का कार्य प्रदेश को तीन जोन में बांटकर कराया गया, जिसके मुख्यालय मेरठ, कानपुर तथा वाराणसी बनाये गये। इस प्रकार निजी नलकूपों हेतु बोरिंग का कार्य पहले एग्रीकल्चरल इन्जीनियरिंग विभाग के माध्यम से किया जाता था। पहली जुलाई 1954 को इस विभाग को नियोजन विभाग से सम्बद्ध किया गया, तत्पश्चात् वर्ष 1964 में शासनादेश सं0 5819/38-8-517/1964 दिनांक 08.10.1964 द्वारा आयुक्त कृषि उत्पादन एवं ग्राम्य विकास की देख-रेख में लघु सिंचाई विभाग की स्थापना की गयी।
किसी भी नलकूप योजना का लाभ लेने के लिए ये चार चरण हैं।
विभागीय अधिकारी स्थल का सत्यापन कर उसकी जिओ टैगिंग करते हैं।
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योजनावार प्राप्त आवेदन और उनमें से कितने स्थलों की जिओ टैगिंग पूरी हो चुकी है।
आँकड़े पोर्टल पर दर्ज आवेदनों से स्वतः अद्यतन होते हैं।
प्रदेश भर में विभाग द्वारा कराए गए कार्यों की झलकियाँ।










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